
ठण्ड के ऋतू में – 15 दिन
गरमी के ऋतू में – 30 दिन
गरमी का ऋतू – 20 दिन
ठंडी का ऋतू – 30 दिन
वर्षा ऋतू – 15 दिन
गर्मी का ऋतू – 20 दिन
ठंडी का ऋतू – 30 दिन
महान धर्मआराधना
श्री नवकार सूत्र
जीवन प्रवाह
पांव पवित्र कैसे होते है?
विनय का स्वरूप और महत्व|
शील का व्यापक रुप
सुखी जीवन का रहस्य
सज्जन के सात गुण
जगद्गुरु महावीर
असत्य बोलने से वसुराजा की दुर्गति
अरिहंतपद आराधना
तपश्चरण की विधि
प्रवचन
शहद
महान धर्मआराधना
गृहस्थ का जीवन धर्म-साधक का जीवन है । उसके अनेक कर्तव्यों में निम्न कर्तव्य प्रमुख हैं तथा अन्य कर्तव्यों का समावेश इन्हीं में हो जाता है ।
१ शहद - आयुर्वेद में भले ही शहद को स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना हो, परन्तु अहिंसा और करुणा की भावना रखने वालों के लिए यह नितांत त्याज्य है । मधुमक्खी फूलों का रस चूसकर छत्ते में लाकर उसको थूक देती है । भँवरे व मधुमक्खियों की लार व थूक से फिर शहद तैयार होता है । छत्ते में हजारों मधुमक्खियों के घर बने होते हैं । शहद एकत्र करने के लिए छत्ते के नीचे धुआँ किया जाता है । धुएँ से डरकर मधुमक्खियाँ उड जाती हैं, फिर छत्ते को तोडकर निचोडकर उसका शहद निकाला जाता है । निचोडने में छत्ते में रही अनेक मधुमक्खियाँ एवं उनके हजारों अंडे नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार शहद प्राप्ति के लिए अगणित जीवों की हिंसा की जाती है । उनके घर नष्ट किये जाते हैं । हिंसा से प्राप्त होने वाला शहद काम में लेने वाला उस हिंसा दोष का भागी होता ही है ।
२ मक्खन (बटर पोलशन) - छाछ से बाहर निकालने के बाद मक्खन में उसी रंग के त्रस जीवों की उत्पत्ति होती है । मक्खन स्वयं विकारोत्तेजक और काम वासना बढाने वाला है । बासी मक्खन में तो हर क्षण रसज जीवों की उत्पत्ति होती रहती है । जीवों-क्रमियों का पिंड ऐसा मक्खन स्वास्थ्य के लिए घातक, सदविचारों का घात करने वाला तथा हिंसा जनित है ।
३ मांस - मांस खाना महापाप है ।
क्योंकि यह निर्दोष मूक पशु-पक्षियों की हिंसा से प्राप्त होता है । तडफते-रोते, क्रन्दन करते मूक जीव मारने वालों के प्रति द्वेष, घृणा, क्रोध और भय के भावों से भरे होते हैं । इन व्यग्र भावों से उनके रक्त और मांस दूषित-जहरीले हो जाते हैं । वह दूषित विषाक्त मांस खाने वालों के विचार भी हिंसा, द्वेष, घृणा आदि दुर्भावों से भर जाते हैं । मांस खाने वाले का हृदय तामसी, निर्दय एवं क्रूर बन जाता है । इसके साथ ही रखे हुए मांस में अनन्तकाय के जीव, त्रस जीव एवं सम्मूर्च्छिम जीवों की उत्पत्ति होती रहती है । मांस, अंडा आदि घृणित होने के साथ महाहिंसा का कारण है । नरक जाने का मुख्य निमित्त है और अनेक भयंकर रोगों को जन्म देने वाला है । इसका त्याग आवश्यक है ।
४ शराब - शराब का अर्थ है सडा हुआ पानी । सभी प्रकार की शराब अगणित असंख्य जीवों की हत्या से ही बनती है । शराब पीने वाले की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है । उसकी भावनाएँ उत्तेजित और दूषित रहती हैं । समझने-सोचने की शक्ति नष्ट हो जाती है और स्वास्थ्य भी चौपट होता है । शराब पीने से हजारों-लाखों परिवार बर्बाद हो जाते हैं । सुहागनें विधवा हो जाती है और नन्हे-मुन्ने अनाथ होकर दर-दर की ठोकरें खाते हैं । शराबी मनुष्य की बुद्धि हिंसा और दुराचार की ओर जाती है । धर्म की हानि, धन की हानि होती है । स्वास्थ्य की बर्बादी और देश की तबाही करने वाली शराब मानव जीवन के लिए सबसे बडा अभिशाप है ।
५ रात्रि भोजन - रात में भोजन करने से खाद्य पदार्थों में अनेक सूक्ष्म जीव-जंतु, कीट-पतंगे मिलकर पेट में चले जाते हैं । ऐसा त्रस जीव युक्त भोजन शाकाहारी कैसे हो सकता है ? अर्थात् रात को खाना मांसाहार करने के समान है । अनेक प्रकार की बीमारियाँ भी हो जाती है । रात्रि भोजन को सात्विक भोजन भी नहीं कहा जा सकता ।
धर्मशास्त्र के अनुसार रात्रि भोजन करने वाला परभव में कुत्ता, बिल्ली, छिपकली, साँप-बिच्छु आदि बनता है और नरक में जाने पर घोर यातनाँ भोगता है ।
६ द्विदल भोजन - दाल आदि दो दल वाले पदार्थों को द्विदल कहा जाता है । ऐसे पदार्थ दही या कच्चे दूध-छाछ के साथ मिलाने से उनमें तुरन्त बेइन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति होने लगती है । जीव हिंसा के साथ-साथ चर्म रोग भी बढते हैं, स्वास्थ्य भी बिगड जाता है । अतः द्विदल में छाछ-दही या कच्चा दूध मिलाकर खाना अभक्ष्य है । बेसन के पदार्थों के साथ दही, कच्चा दूध मिलाकर खाने से भी वह अभक्ष्य बन जाता है । जैसे दही-पकौडी या दही बडे आदि । अतः ऐसा अभक्ष्य भोजन कभी नहीं करना चाहिए ।
७ अनन्तकाय-कन्दमूल, बर्फ आईसक्रीम - आलू, प्याज, लहसुन, हरी हल्दी, अदरक, मूली, शकरकंद, गाजर आदि अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ अनन्तकाय कहीं जाती हैं । अर्थात् जिस जीव के एक शरीर में अनन्त जीव रहते हों, वह अनन्तकाय है । ऐसी वनस्पतियाँ खाने वाला अपने भोजन में अनन्त-अनन्त जीवों का भक्षण करता है । इसके अलावा बर्फ आइसक्रीम आदि में भी जीवों की उत्पत्ति हो जाती है । इसका सेवन ही सर्वथा हिंसाजन्य है । इससे भी बचना चाहिये ।
अनन्तकाय का भक्षण महा हिंसा है, अभक्ष्य है । श्रावक के लिए त्याज्य है ।
८ चलित रस - समय व्यतीत होने के साथ वस्तुओं के रंग, रस, गंध, स्पर्श बिगड जाने से उस वस्तु
का रस चलित हो जाता है । उस समय दो इन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति होती है । जैसे - बासी अन्न, साग-सब्जी, चावल, दाल, आदि रात्रि व्यतीत होने के पश्चात् बासी हो जाते हैं । सूर्यास्त हो जाने के पन्द्रह दिन एवं चातुर्मास में सात दिन बाद चलित रस हो जाते हैं । आर्द्रा नक्षत्र लगने के बाद आम, चातुर्मास में मेवा, पत्ती का साग आदि अभक्ष्य है । दो रात निकलने के बाद बासी दही में भी जीवोत्पत्ति हो जाती है । ‘चलित रस’ एक प्रकार की ‘एक्सपायर डेट’ वस्तु है जो कालातीत होने पर खाने योग्य नहीं रहती । शास्त्रीय भाषा में उसे चलित रस समझना चाहिए । (चित्र पिछले पृष्ठ पर देखें ।)
९ अनन्तकाय - (कंद-मूल आदि) वनस्पति दो प्रकार की है । एक प्रत्येक तथा दूसरी साधारण । प्रत्येक वनस्पति में एक शरीर में एक जीव होता है, जैसे फल आदि । साधारण वनस्पति के एक शरीर में अनन्त जीव रहते हैं । उनका शरीर भी अत्यन्त सूक्ष्म होता है । उदाहरण रूप में आलू, मूली, जमीकन्द साधारण वनस्पति है । इसके एक सूई की नौंक टिके इतने पाइंट पर टच करें उतने स्थान में असंख्य सूक्ष्म शरीर होते हैं और एक-एक शरीर में अनन्त जीव रहते हैं । कल्पना करो कि कन्द के एक शरीर में रहे अनन्त जीवों को यदि चिडिया जितने बडा बनाकर आकाश में उडा दिया जाय तो यह सम्पूर्ण आकाश उन जीवों से भर जायेगा तब भी एक शरीर के जीव खाली नहीं होंगे । इससे समझें एक पूरे आलू में कितने जीव होंगे ? अनन्तकाय के ३२ प्रकार हैं । मुख्यतः भूमिकंद, आलू, मूली, गाजर, प्याज, पालक आदि, हल्दी, अदरक थूहर, वज्रकंद आदि ये सभी अनन्तकाय हैं । अनन्तकाय को खाने वाला अनन्त जीवों की हिंसा का पाप करता है ।
तुच्छ पदार्थ -
१० बर्फ - यह दो प्रकार की होती है - (अ) प्राकृतिक - शीत प्रदेशों में ऊँचे पर्वतों पर गिरने वाला हिमपात । शीतकाल में स्नोफॊल होता है तथा गर्मी में पिघलकर पानी बन जाती है । (ब) कृत्रिम - मशीनों से -१८०ष्टटेम्प्रेचर पर जमाया हुआ पानी बर्फ (आईस व आईसक्यूब) बन जाता है । जैनदर्शन के अनुसार पानी की एक-एक बूंद में असंख्य जीव होते है । कल्पना करो कि एक बूँद के पानी व सूक्ष्म जीवों का सरसों जितना बडा बनाकर पूरे एक लाख योजन के जम्बूद्वीप में ठसाठस भर दिया जाय तब भी एक बूँद के जीव समाप्त नहीं होते । पानी में तथा जमी हुई बर्फ में सूक्ष्म बेइन्द्रिय जीव भी असंख्य रहते हैं । अनछाना पानी पीने से वे भी पेट में चले जाते हैं । शरीर विज्ञान की दृष्टि से बर्फ खाने से शरीर की जठराग्नि मंद पडती है । यह जठराग्नि की हमारे शरीर में ऊर्जा (एनर्जी) उत्पन्न करती है । मनुष्य के शरीर का सामान्य टेम्प्रेचर ९८०फेरानहीट रहना चाहिए । बर्फ खाने या बर्फ के पदार्थ आईसक्रीम, फ्रीज का पानी, आइस केन्डी तथा बहुत अधिक ठंडे पदार्थ खाने से पेट की भूख खत्म हो जाती है । जठाग्नि मंद पडने से अनेक बीमारियाँ होती हैं । इस प्रकार धार्मिक तथा शारीरिक दोनों दृष्टियों से बर्फ खाना अत्यन्त हानिकारक है ।
११ करा - आकाश से गिरने वाले ओले को ‘करा’ कहा जाता है । ये भी बर्फ की भाँति त्याज्य है ।
१२ विष - ‘जहर’ जिन्दगी को समाप्त करने वाला है । अनेक प्रकार का जहर आज मिलता है, जैसे- (क) प्राणिज-साँप, बिच्छू, पागल कुत्ता, छिपकली आदि का जहर । (ख) वनस्पतिक-अफीम, धतूरा आदि का । (ग) रासायनिक- पोटेशियम साईनाइट, आर्सेनिक, बेगोन, डी.डी.टी., (घ) सोमल, हडताल आदि । ये सभी प्रकार के जहर प्राणाघातक होते हैं । अंग्रेजी ऐन्टीवायोटिक्स दवाई का निर्माण भी जहर से होता है ।
१३ मिट्टी - चौक, स्लेट, खडी, कच्चा नमक आदि सभी मिट्टी वर्ग में है । यह भी अभक्ष्य है । क्योंकि इनमें असंख्य जीव होते हैं तथा बहुत सी हानिकारक चीजें भी मिली रहती है ।
१४ बहुबीजा फल - जिन फलों में बीज अधिक मात्रा में रहते हैं । जैसे-अंजीर, खसखस दाना, राजगरा आदि । यह भी अभक्ष्य है ।
१५ बैंगन - यह कन्दमूल तो नहीं है परन्तु इसमें भी बीज बहुत होते हैं तथा इसकी टोपी में सूक्ष्म त्रस जीव रहते हैं । बात, पित्त, कफ वर्धक तथा आलस्य बढाने वाला है । इसके खाने से मन में तामसिकता व चंचलता बढती है । अतः हिंसा व आरोग्य दोनों ही दृष्टियों से यह त्याज्य है ।
१६ तुच्छफल - जिनमें खाने का अल्प तथा फैंकने योग्य तत्त्व अधिक होता है, जैसे-बेर, जामुन, सीताफल आदि ।
१७ अनजाना फल - जिन फलों का नाम भी नहीं मालूम हो, जिनको खाने से लाभ या हानि का भी पता न हो, यदि वे जहरीले होंगे तो आत्मघाती भी हो सकता है, इसलिए वे अभक्ष्य हैं ।
१८-२२ पाँच प्रकार के उदम्बर फल- १. बड का फल, २. उमर (उदम्बर, गूलर) का फल, ३. काला उमरा कचुंबर का फल, ४. पारस पीपला या पीपल का फल, ५. प्लक्ष (पीपला) का फल । इन बीजों से पेट भी नहीं भरता थोडे से स्वाद के लिए इतने जीवों का भक्षण करना उचित नहीं है ।
इस प्रकार ये २२ अभक्ष्य प्रत्येक गृहस्थ के लिए त्याज्य है ।
जैन आचार्यों ने भोजन के विषय में बहुत ही सूक्ष्मतापूर्वक व्यापक दृष्टि से चिन्तन किया है । उसमें अहिंसा की दृष्टि तो मुख्य है ही, साथ ही जिस भोजन से विचारों में तामसिकता व चंचलता बढती हो, शरीर में रोग आदि उत्पन्न होने की सम्भावना रहती हो, उस दृष्टि से भी विचार कर धार्मिक, मानसिक तथा शारीरिक तीनों प्रकार के आरोग्य व स्वस्थता की दृष्टि से कुछ पदार्थों को अभक्ष्य कोटि का बताया है । उनको खाना सामान्यतः प्रत्येक गृहस्थ के लिए वर्जनीय है, किन्तु जैन श्रावक को तो उनका अवश्य ही परित्याग करना चाहिए ।
जैन आचार्यों ने उन २२ प्रकार के अभक्ष्य (नहीं खाने योग्य) पदार्थों की सूची इस प्रकार दी है-
महाविगय - ‘विगय’ का अर्थ है जिसके सेवन से जीव के भाव विकृत हो जायें । दूध, दही, घी, तेल, गुड, शक्कर और तली हुई वस्तुएँ आदि भी विगय हैं, किन्तु यह अभक्ष्य नहीं हैं । निम्न चार महाविगय अधिक विकार वर्द्धक होने से अभक्ष्य है-
१ मांस - विभिन्न जीवधारियों का घात कर ही मांस प्राप्त किया जाता है । मांस दीखने में भी घृणास्पद दीखता है । इसके लिए बेहद क्रूरता और निर्दयतापूर्वक जीवों का वध किया जाता है । वह मुख्यतः तीन प्रकार के जीवों से प्राप्त होता है- (अ) जलचर - मछली आदि, (ब) स्थलचर - पाडा, बकरा, हिरण, गाय, भैंस, सूअर आदि, (स) खेचर - चिडिया, मुर्गी, कबूतर आदि । इनके अंगे व मांस आदि । मांसाहार का त्याग करने वालों को अंडा, अंडे के रस से बनी चाकलेट, बिस्किट, आइसक्रीम, चुंइगम आदि का उपयोग भी नहीं करना चाहिए । इनमें मछलियों का आटा तथा चर्बी आदि मिलती है ।
मांस खाने से अनेक प्रकार के जटिल रोग हो जाते हैं । लगभग १६० प्रकार की बीमारियाँ मांसाहार से होती है ।
२ मदिरा - मदिरा का निर्माण अनेक वस्तुओं को सडाने से होता है । सडाने की प्रक्रिया में प्रतिक्षण बेइन्द्रिय आदि असंख्य जीव पैदा होते रहते हैं । उन सबके सहित मशीन से उस सडन का रस निचोडने से अनेक जीवों की हिंसा होती है । मदिरापान अहिंसा, आरोग्य एवं नैतिक दृष्टि से त्याज्य है । हमारे शरीर का लीवर जो दूसरे ५०० प्रकार के जहर का शोधन कर सकता है, वह मदिरा पान से विकृत व निष्क्रिय हो जाता है ।
३ मधु (शहद)- मधु प्राप्त करने की क्रिया के दौरान अनेक मक्खियों आदि को प्राणों से हाथ धोने पडते हैं । इसके अलावा जिस प्रकार किसी व्यक्ति का अनेक वर्षों तक अत्यन्त परिश्रम से संग्रह किया हुआ धन एक ही रात में चोर चुरा कर ले जाए तो उसको एवं उसके परिवार वालों को कितना भारी दुःख होता है, उसी प्रकार मक्खियों द्वारा बहुत परिश्रम से संचित मधु को उनको अत्यन्त कष्ट देकर हरण कर लिया जाए तो कितना दुःख होगा । कहते हैं ‘मधु’ मक्खियों के शरीर से निकला हुआ ‘मल’ है । उसमें उनके मुँह की ‘लार’ भी मिली रहती है । अतः यह घृणास्पद गर्हित अखाद्य है । इसके अतिरिक्त मधु में उसी वर्ण के असंख्य जीव पैदा होते है ।
४ मक्खन - मक्खन में छाछ में से निकलते ही अनेक सूक्ष्म जीव उत्पन्न हो जाते हैं । अतः हिंसा की दृष्टि से वह त्याज्य है तथा विकार वर्धक तो है ही ।
सांयोगिक अभक्ष्य- जो वस्तु किसी अन्य संयोग के मिलने पर अभक्ष्य बन जाती है, वह सांयोगिक अभक्ष्य है, जैसे-
५ द्विदल- जिस धान्य के दो दल बन जाते हैं, वह द्विदल है । जैसे चना, मूंग, मटर, उडद, तुवर, चावल, मसूर आदि । इनके दाने तथा आटा आदि भी द्विदल में आता है । ध्यान रहे, अकेली दालें अभक्ष्य नहीं हैं, परन्तु जब यह दूध, दही आदि में मिला दी जाती है, तब इनमें सूक्ष्म बेइन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति होने लगती है । उसे खाने से हिंसा का दोष लगता है । इसलिए यह सांयोगिक अभक्ष्य है । ये सूक्ष्म जीव जिस
रंग की वस्तु होती है, उसी रंग के होते हैं । अतः अति सूक्ष्म होने से तथा रंग में मिल जाने से दिखाई नहीं पडते ।
६ अचार अथाणा- आजकल प्रायः बाजार का बना अचार अथाणा आदि खाने के लिए उपलब्ध होता है । पहली बात, यह प्रायः बाजार की सडी-गली, बासी वस्तुओं से बनाया जाता है । दूसरी बात, इसमें एसिड पेट व आंतों के लिए भयंकर नुकसान कारक है । तीसरी बात, इसमें उसी रंग के सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती रहती है । इसका प्रयोग मात्र जीभ के स्वाद के लिए ही होता है । इस तरह यह सात्विकता व अहिंसा की दृष्टि से तो त्याज्य है ही आरोग्य दृष्टि से...जिनाज्ञा विरुद्ध कुछ भी लिखा गया हो तो मिच्छामी दुक्कड़म
श्री नवकार सूत्र
जीवन प्रवाह
पांव पवित्र कैसे होते है?
विनय का स्वरूप और महत्व|
शील का व्यापक रुप
सुखी जीवन का रहस्य
सज्जन के सात गुण
जगद्गुरु महावीर
असत्य बोलने से वसुराजा की दुर्गति
अरिहंतपद आराधना
तपश्चरण की विधि
प्रवचन
शहद
महान धर्मआराधना
गृहस्थ का जीवन धर्म-साधक का जीवन है । उसके अनेक कर्तव्यों में निम्न कर्तव्य प्रमुख हैं तथा अन्य कर्तव्यों का समावेश इन्हीं में हो जाता है ।
१ शहद - आयुर्वेद में भले ही शहद को स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना हो, परन्तु अहिंसा और करुणा की भावना रखने वालों के लिए यह नितांत त्याज्य है । मधुमक्खी फूलों का रस चूसकर छत्ते में लाकर उसको थूक देती है । भँवरे व मधुमक्खियों की लार व थूक से फिर शहद तैयार होता है । छत्ते में हजारों मधुमक्खियों के घर बने होते हैं । शहद एकत्र करने के लिए छत्ते के नीचे धुआँ किया जाता है । धुएँ से डरकर मधुमक्खियाँ उड जाती हैं, फिर छत्ते को तोडकर निचोडकर उसका शहद निकाला जाता है । निचोडने में छत्ते में रही अनेक मधुमक्खियाँ एवं उनके हजारों अंडे नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार शहद प्राप्ति के लिए अगणित जीवों की हिंसा की जाती है । उनके घर नष्ट किये जाते हैं । हिंसा से प्राप्त होने वाला शहद काम में लेने वाला उस हिंसा दोष का भागी होता ही है ।
२ मक्खन (बटर पोलशन) - छाछ से बाहर निकालने के बाद मक्खन में उसी रंग के त्रस जीवों की उत्पत्ति होती है । मक्खन स्वयं विकारोत्तेजक और काम वासना बढाने वाला है । बासी मक्खन में तो हर क्षण रसज जीवों की उत्पत्ति होती रहती है । जीवों-क्रमियों का पिंड ऐसा मक्खन स्वास्थ्य के लिए घातक, सदविचारों का घात करने वाला तथा हिंसा जनित है ।
३ मांस - मांस खाना महापाप है ।
क्योंकि यह निर्दोष मूक पशु-पक्षियों की हिंसा से प्राप्त होता है । तडफते-रोते, क्रन्दन करते मूक जीव मारने वालों के प्रति द्वेष, घृणा, क्रोध और भय के भावों से भरे होते हैं । इन व्यग्र भावों से उनके रक्त और मांस दूषित-जहरीले हो जाते हैं । वह दूषित विषाक्त मांस खाने वालों के विचार भी हिंसा, द्वेष, घृणा आदि दुर्भावों से भर जाते हैं । मांस खाने वाले का हृदय तामसी, निर्दय एवं क्रूर बन जाता है । इसके साथ ही रखे हुए मांस में अनन्तकाय के जीव, त्रस जीव एवं सम्मूर्च्छिम जीवों की उत्पत्ति होती रहती है । मांस, अंडा आदि घृणित होने के साथ महाहिंसा का कारण है । नरक जाने का मुख्य निमित्त है और अनेक भयंकर रोगों को जन्म देने वाला है । इसका त्याग आवश्यक है ।
४ शराब - शराब का अर्थ है सडा हुआ पानी । सभी प्रकार की शराब अगणित असंख्य जीवों की हत्या से ही बनती है । शराब पीने वाले की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है । उसकी भावनाएँ उत्तेजित और दूषित रहती हैं । समझने-सोचने की शक्ति नष्ट हो जाती है और स्वास्थ्य भी चौपट होता है । शराब पीने से हजारों-लाखों परिवार बर्बाद हो जाते हैं । सुहागनें विधवा हो जाती है और नन्हे-मुन्ने अनाथ होकर दर-दर की ठोकरें खाते हैं । शराबी मनुष्य की बुद्धि हिंसा और दुराचार की ओर जाती है । धर्म की हानि, धन की हानि होती है । स्वास्थ्य की बर्बादी और देश की तबाही करने वाली शराब मानव जीवन के लिए सबसे बडा अभिशाप है ।
५ रात्रि भोजन - रात में भोजन करने से खाद्य पदार्थों में अनेक सूक्ष्म जीव-जंतु, कीट-पतंगे मिलकर पेट में चले जाते हैं । ऐसा त्रस जीव युक्त भोजन शाकाहारी कैसे हो सकता है ? अर्थात् रात को खाना मांसाहार करने के समान है । अनेक प्रकार की बीमारियाँ भी हो जाती है । रात्रि भोजन को सात्विक भोजन भी नहीं कहा जा सकता ।
धर्मशास्त्र के अनुसार रात्रि भोजन करने वाला परभव में कुत्ता, बिल्ली, छिपकली, साँप-बिच्छु आदि बनता है और नरक में जाने पर घोर यातनाँ भोगता है ।
६ द्विदल भोजन - दाल आदि दो दल वाले पदार्थों को द्विदल कहा जाता है । ऐसे पदार्थ दही या कच्चे दूध-छाछ के साथ मिलाने से उनमें तुरन्त बेइन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति होने लगती है । जीव हिंसा के साथ-साथ चर्म रोग भी बढते हैं, स्वास्थ्य भी बिगड जाता है । अतः द्विदल में छाछ-दही या कच्चा दूध मिलाकर खाना अभक्ष्य है । बेसन के पदार्थों के साथ दही, कच्चा दूध मिलाकर खाने से भी वह अभक्ष्य बन जाता है । जैसे दही-पकौडी या दही बडे आदि । अतः ऐसा अभक्ष्य भोजन कभी नहीं करना चाहिए ।
७ अनन्तकाय-कन्दमूल, बर्फ आईसक्रीम - आलू, प्याज, लहसुन, हरी हल्दी, अदरक, मूली, शकरकंद, गाजर आदि अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ अनन्तकाय कहीं जाती हैं । अर्थात् जिस जीव के एक शरीर में अनन्त जीव रहते हों, वह अनन्तकाय है । ऐसी वनस्पतियाँ खाने वाला अपने भोजन में अनन्त-अनन्त जीवों का भक्षण करता है । इसके अलावा बर्फ आइसक्रीम आदि में भी जीवों की उत्पत्ति हो जाती है । इसका सेवन ही सर्वथा हिंसाजन्य है । इससे भी बचना चाहिये ।
अनन्तकाय का भक्षण महा हिंसा है, अभक्ष्य है । श्रावक के लिए त्याज्य है ।
८ चलित रस - समय व्यतीत होने के साथ वस्तुओं के रंग, रस, गंध, स्पर्श बिगड जाने से उस वस्तु
का रस चलित हो जाता है । उस समय दो इन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति होती है । जैसे - बासी अन्न, साग-सब्जी, चावल, दाल, आदि रात्रि व्यतीत होने के पश्चात् बासी हो जाते हैं । सूर्यास्त हो जाने के पन्द्रह दिन एवं चातुर्मास में सात दिन बाद चलित रस हो जाते हैं । आर्द्रा नक्षत्र लगने के बाद आम, चातुर्मास में मेवा, पत्ती का साग आदि अभक्ष्य है । दो रात निकलने के बाद बासी दही में भी जीवोत्पत्ति हो जाती है । ‘चलित रस’ एक प्रकार की ‘एक्सपायर डेट’ वस्तु है जो कालातीत होने पर खाने योग्य नहीं रहती । शास्त्रीय भाषा में उसे चलित रस समझना चाहिए । (चित्र पिछले पृष्ठ पर देखें ।)
९ अनन्तकाय - (कंद-मूल आदि) वनस्पति दो प्रकार की है । एक प्रत्येक तथा दूसरी साधारण । प्रत्येक वनस्पति में एक शरीर में एक जीव होता है, जैसे फल आदि । साधारण वनस्पति के एक शरीर में अनन्त जीव रहते हैं । उनका शरीर भी अत्यन्त सूक्ष्म होता है । उदाहरण रूप में आलू, मूली, जमीकन्द साधारण वनस्पति है । इसके एक सूई की नौंक टिके इतने पाइंट पर टच करें उतने स्थान में असंख्य सूक्ष्म शरीर होते हैं और एक-एक शरीर में अनन्त जीव रहते हैं । कल्पना करो कि कन्द के एक शरीर में रहे अनन्त जीवों को यदि चिडिया जितने बडा बनाकर आकाश में उडा दिया जाय तो यह सम्पूर्ण आकाश उन जीवों से भर जायेगा तब भी एक शरीर के जीव खाली नहीं होंगे । इससे समझें एक पूरे आलू में कितने जीव होंगे ? अनन्तकाय के ३२ प्रकार हैं । मुख्यतः भूमिकंद, आलू, मूली, गाजर, प्याज, पालक आदि, हल्दी, अदरक थूहर, वज्रकंद आदि ये सभी अनन्तकाय हैं । अनन्तकाय को खाने वाला अनन्त जीवों की हिंसा का पाप करता है ।
तुच्छ पदार्थ -
१० बर्फ - यह दो प्रकार की होती है - (अ) प्राकृतिक - शीत प्रदेशों में ऊँचे पर्वतों पर गिरने वाला हिमपात । शीतकाल में स्नोफॊल होता है तथा गर्मी में पिघलकर पानी बन जाती है । (ब) कृत्रिम - मशीनों से -१८०ष्टटेम्प्रेचर पर जमाया हुआ पानी बर्फ (आईस व आईसक्यूब) बन जाता है । जैनदर्शन के अनुसार पानी की एक-एक बूंद में असंख्य जीव होते है । कल्पना करो कि एक बूँद के पानी व सूक्ष्म जीवों का सरसों जितना बडा बनाकर पूरे एक लाख योजन के जम्बूद्वीप में ठसाठस भर दिया जाय तब भी एक बूँद के जीव समाप्त नहीं होते । पानी में तथा जमी हुई बर्फ में सूक्ष्म बेइन्द्रिय जीव भी असंख्य रहते हैं । अनछाना पानी पीने से वे भी पेट में चले जाते हैं । शरीर विज्ञान की दृष्टि से बर्फ खाने से शरीर की जठराग्नि मंद पडती है । यह जठराग्नि की हमारे शरीर में ऊर्जा (एनर्जी) उत्पन्न करती है । मनुष्य के शरीर का सामान्य टेम्प्रेचर ९८०फेरानहीट रहना चाहिए । बर्फ खाने या बर्फ के पदार्थ आईसक्रीम, फ्रीज का पानी, आइस केन्डी तथा बहुत अधिक ठंडे पदार्थ खाने से पेट की भूख खत्म हो जाती है । जठाग्नि मंद पडने से अनेक बीमारियाँ होती हैं । इस प्रकार धार्मिक तथा शारीरिक दोनों दृष्टियों से बर्फ खाना अत्यन्त हानिकारक है ।
११ करा - आकाश से गिरने वाले ओले को ‘करा’ कहा जाता है । ये भी बर्फ की भाँति त्याज्य है ।
१२ विष - ‘जहर’ जिन्दगी को समाप्त करने वाला है । अनेक प्रकार का जहर आज मिलता है, जैसे- (क) प्राणिज-साँप, बिच्छू, पागल कुत्ता, छिपकली आदि का जहर । (ख) वनस्पतिक-अफीम, धतूरा आदि का । (ग) रासायनिक- पोटेशियम साईनाइट, आर्सेनिक, बेगोन, डी.डी.टी., (घ) सोमल, हडताल आदि । ये सभी प्रकार के जहर प्राणाघातक होते हैं । अंग्रेजी ऐन्टीवायोटिक्स दवाई का निर्माण भी जहर से होता है ।
१३ मिट्टी - चौक, स्लेट, खडी, कच्चा नमक आदि सभी मिट्टी वर्ग में है । यह भी अभक्ष्य है । क्योंकि इनमें असंख्य जीव होते हैं तथा बहुत सी हानिकारक चीजें भी मिली रहती है ।
१४ बहुबीजा फल - जिन फलों में बीज अधिक मात्रा में रहते हैं । जैसे-अंजीर, खसखस दाना, राजगरा आदि । यह भी अभक्ष्य है ।
१५ बैंगन - यह कन्दमूल तो नहीं है परन्तु इसमें भी बीज बहुत होते हैं तथा इसकी टोपी में सूक्ष्म त्रस जीव रहते हैं । बात, पित्त, कफ वर्धक तथा आलस्य बढाने वाला है । इसके खाने से मन में तामसिकता व चंचलता बढती है । अतः हिंसा व आरोग्य दोनों ही दृष्टियों से यह त्याज्य है ।
१६ तुच्छफल - जिनमें खाने का अल्प तथा फैंकने योग्य तत्त्व अधिक होता है, जैसे-बेर, जामुन, सीताफल आदि ।
१७ अनजाना फल - जिन फलों का नाम भी नहीं मालूम हो, जिनको खाने से लाभ या हानि का भी पता न हो, यदि वे जहरीले होंगे तो आत्मघाती भी हो सकता है, इसलिए वे अभक्ष्य हैं ।
१८-२२ पाँच प्रकार के उदम्बर फल- १. बड का फल, २. उमर (उदम्बर, गूलर) का फल, ३. काला उमरा कचुंबर का फल, ४. पारस पीपला या पीपल का फल, ५. प्लक्ष (पीपला) का फल । इन बीजों से पेट भी नहीं भरता थोडे से स्वाद के लिए इतने जीवों का भक्षण करना उचित नहीं है ।
इस प्रकार ये २२ अभक्ष्य प्रत्येक गृहस्थ के लिए त्याज्य है ।
जैन आचार्यों ने भोजन के विषय में बहुत ही सूक्ष्मतापूर्वक व्यापक दृष्टि से चिन्तन किया है । उसमें अहिंसा की दृष्टि तो मुख्य है ही, साथ ही जिस भोजन से विचारों में तामसिकता व चंचलता बढती हो, शरीर में रोग आदि उत्पन्न होने की सम्भावना रहती हो, उस दृष्टि से भी विचार कर धार्मिक, मानसिक तथा शारीरिक तीनों प्रकार के आरोग्य व स्वस्थता की दृष्टि से कुछ पदार्थों को अभक्ष्य कोटि का बताया है । उनको खाना सामान्यतः प्रत्येक गृहस्थ के लिए वर्जनीय है, किन्तु जैन श्रावक को तो उनका अवश्य ही परित्याग करना चाहिए ।
जैन आचार्यों ने उन २२ प्रकार के अभक्ष्य (नहीं खाने योग्य) पदार्थों की सूची इस प्रकार दी है-
महाविगय - ‘विगय’ का अर्थ है जिसके सेवन से जीव के भाव विकृत हो जायें । दूध, दही, घी, तेल, गुड, शक्कर और तली हुई वस्तुएँ आदि भी विगय हैं, किन्तु यह अभक्ष्य नहीं हैं । निम्न चार महाविगय अधिक विकार वर्द्धक होने से अभक्ष्य है-
१ मांस - विभिन्न जीवधारियों का घात कर ही मांस प्राप्त किया जाता है । मांस दीखने में भी घृणास्पद दीखता है । इसके लिए बेहद क्रूरता और निर्दयतापूर्वक जीवों का वध किया जाता है । वह मुख्यतः तीन प्रकार के जीवों से प्राप्त होता है- (अ) जलचर - मछली आदि, (ब) स्थलचर - पाडा, बकरा, हिरण, गाय, भैंस, सूअर आदि, (स) खेचर - चिडिया, मुर्गी, कबूतर आदि । इनके अंगे व मांस आदि । मांसाहार का त्याग करने वालों को अंडा, अंडे के रस से बनी चाकलेट, बिस्किट, आइसक्रीम, चुंइगम आदि का उपयोग भी नहीं करना चाहिए । इनमें मछलियों का आटा तथा चर्बी आदि मिलती है ।
मांस खाने से अनेक प्रकार के जटिल रोग हो जाते हैं । लगभग १६० प्रकार की बीमारियाँ मांसाहार से होती है ।
२ मदिरा - मदिरा का निर्माण अनेक वस्तुओं को सडाने से होता है । सडाने की प्रक्रिया में प्रतिक्षण बेइन्द्रिय आदि असंख्य जीव पैदा होते रहते हैं । उन सबके सहित मशीन से उस सडन का रस निचोडने से अनेक जीवों की हिंसा होती है । मदिरापान अहिंसा, आरोग्य एवं नैतिक दृष्टि से त्याज्य है । हमारे शरीर का लीवर जो दूसरे ५०० प्रकार के जहर का शोधन कर सकता है, वह मदिरा पान से विकृत व निष्क्रिय हो जाता है ।
३ मधु (शहद)- मधु प्राप्त करने की क्रिया के दौरान अनेक मक्खियों आदि को प्राणों से हाथ धोने पडते हैं । इसके अलावा जिस प्रकार किसी व्यक्ति का अनेक वर्षों तक अत्यन्त परिश्रम से संग्रह किया हुआ धन एक ही रात में चोर चुरा कर ले जाए तो उसको एवं उसके परिवार वालों को कितना भारी दुःख होता है, उसी प्रकार मक्खियों द्वारा बहुत परिश्रम से संचित मधु को उनको अत्यन्त कष्ट देकर हरण कर लिया जाए तो कितना दुःख होगा । कहते हैं ‘मधु’ मक्खियों के शरीर से निकला हुआ ‘मल’ है । उसमें उनके मुँह की ‘लार’ भी मिली रहती है । अतः यह घृणास्पद गर्हित अखाद्य है । इसके अतिरिक्त मधु में उसी वर्ण के असंख्य जीव पैदा होते है ।
४ मक्खन - मक्खन में छाछ में से निकलते ही अनेक सूक्ष्म जीव उत्पन्न हो जाते हैं । अतः हिंसा की दृष्टि से वह त्याज्य है तथा विकार वर्धक तो है ही ।
सांयोगिक अभक्ष्य- जो वस्तु किसी अन्य संयोग के मिलने पर अभक्ष्य बन जाती है, वह सांयोगिक अभक्ष्य है, जैसे-
५ द्विदल- जिस धान्य के दो दल बन जाते हैं, वह द्विदल है । जैसे चना, मूंग, मटर, उडद, तुवर, चावल, मसूर आदि । इनके दाने तथा आटा आदि भी द्विदल में आता है । ध्यान रहे, अकेली दालें अभक्ष्य नहीं हैं, परन्तु जब यह दूध, दही आदि में मिला दी जाती है, तब इनमें सूक्ष्म बेइन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति होने लगती है । उसे खाने से हिंसा का दोष लगता है । इसलिए यह सांयोगिक अभक्ष्य है । ये सूक्ष्म जीव जिस
रंग की वस्तु होती है, उसी रंग के होते हैं । अतः अति सूक्ष्म होने से तथा रंग में मिल जाने से दिखाई नहीं पडते ।
६ अचार अथाणा- आजकल प्रायः बाजार का बना अचार अथाणा आदि खाने के लिए उपलब्ध होता है । पहली बात, यह प्रायः बाजार की सडी-गली, बासी वस्तुओं से बनाया जाता है । दूसरी बात, इसमें एसिड पेट व आंतों के लिए भयंकर नुकसान कारक है । तीसरी बात, इसमें उसी रंग के सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती रहती है । इसका प्रयोग मात्र जीभ के स्वाद के लिए ही होता है । इस तरह यह सात्विकता व अहिंसा की दृष्टि से तो त्याज्य है ही आरोग्य दृष्टि से...जिनाज्ञा विरुद्ध कुछ भी लिखा गया हो तो मिच्छामी दुक्कड़म
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THANKS FOR VISITING.
बहुत सुंदर जानकारी ऐकता बैन अनुमोदना
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