ॐ ह्रीँ श्री शंखेश्वरपार्श्वनाथाय नम: દર્શન પોતે કરવા પણ બીજા મિત્રો ને કરાવવા આ ને મારું સદભાગ્ય સમજુ છું.........જય જીનેન્દ્ર.......

संगमदेव वीर प्रभु से पूछते है

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प्रश्न : संगमदेव वीर प्रभु से पूछते है घोरातिघोर संकट दिये तब कुछ नही हुआ और अभी आंख में आंसू ? 

तब वीर प्रभु इसका क्या जवाब देते हैं ? 

उ. महावीर प्रभु ने कहा - " संगम, तुम जो सोच रहे हो वैसा नही है । ये आंसू न पीडा से आये, न ये आँसू मेरे लिये है । बल्कि ये आंसू तुम्हारे लिये है । "

महावीर क्या कह रहे है संगम ये समझ नही पाया । वह चकित सा देखता रहा ।

संगम - मेरे लिये आपकी आंखो में आंसू,पर क्यों ? मैं तो आपका शत्रु हूँ, मैंने आपको बहुत पीडा दी है, सताया है ।

वीर प्रभु कहते है - " संगम इस सृष्टि में मेरा कोई शत्रु नही है । सभी मेरे आत्मवत मित्र है । मैं अपने भीतर किसी के लिये शत्रुता नही पाता । कटुता होतो शत्रुता होगी । अपने भीतर सभी के लिये प्रेम ही पाता हूँ ।तुम छह महीने मेरे आसपास रहे । इन छह महीनों में तुमने मेरे निमित्त से कितने कर्म बांधे है । तुम कितने अशांत, कटु बने हो ! भविष्य में तुम्हें इन सबके परिणाम भोगने पडेंगे । यह सब मैं देख रहा हूँ । तुमने मेरे निमित्त से अपना भविष्य कष्टदायी बना लिया है , इस कारण से तुम्हारे लिये मेरी आँख में आंसू उमड आये है ।"

वीर - " मेरा दर्द यही है । मेरी करूणा किसी को दुःखी नहीं देख सकती । मैं नही चाहता कोई भी आत्मा एक-दुसरे के लिये दुःख का कारण बने । "

सारे संसार का दु:ख महावीर प्रभु की आंख में उतर आया हो, इस तरह करूणा आई ।



BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
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