ॐ ह्रीँ श्री शंखेश्वरपार्श्वनाथाय नम: દર્શન પોતે કરવા પણ બીજા મિત્રો ને કરાવવા આ ને મારું સદભાગ્ય સમજુ છું.........જય જીનેન્દ્ર.......

क्षेत्रपाल भैरवदेव, शाहपुर, महाराष्ट्र 🙏 जय श्री क्षेत्रपाल दादा 🙏

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मानस मंदिर, शाहपुर, मुम्बई नाशिक हाईवे में बिराजे चमत्कारी श्री क्षेत्रपाल भैरव दादा और कल शाम हुए दादा के साक्षात् दर्शन ।

मानस मंदिर में वटवृक्ष की ओठ में बिराजे क्षेत्रपाल दादा बहुत ही चमत्कारी है, यहाँ भक्तो की हर मन्नत पूरी होती है ।
यहाँ तीर्थ परिसर में दादा साक्षात् विचरण करते रहते है जिनके दर्शन भक्तों को होते रहते है ऐसा ही सोभाग्य कल हमे मिला (Photo) ।
यहाँ काली चौदस पर दादा साक्षात् रास करते है जिसके दर्शन करने दूर दूर से भक्त आते है ।



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भानियाडा, बड़ोदा के पास जैन मंदिर में विराजित श्री मणिभद्रवीर दादा की मनमोहक प्रतिमा जी।

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ॐ श्री मणिभद्राय नमः ।।

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घरेलु सहू काम सिद्ध करवा चो देव साचा तमे,
ने विघ्नों सघला विनाश करवा, चो शक्ति शाली तमे,
सेवे जे चरणों खरा ह्रदय थी , तेहने उपाधि नथी,
एव श्री मंदिभद्र देव तमने , वंदु खरा भावति....

देव सुख समस्त जानने , जे छे सदा जगता,
सेवना कर्नारना पलकमाँ , कष्टों बघा कापता,
सीधी सर्व मले आने भय टले , आपे सदा सन्मति,
एव श्री मणिभद्र देव तमने वंदु घना भाव थी.......

जय हो मणिभद्र वीर दादा की _

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जैन धर्मं में मनुष्य जीवन को पाप पुण्य के अनुसार फल मिलते है ऐसा बताया गया है

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जैन धर्मं में मनुष्य जीवन को पाप पुण्य के अनुसार फल मिलते है ऐसा बताया गया है, अगर पुण्य अर्जित की तो उसके उदय से सुख और पाप किया तो उसके उदय से दुःख ही मिलता है। शास्त्रों में पुण्य ही पुण्य कमाने के कुछ सरल तरीके बताये है।

५५०० सौनेया खर्चकर जीवभिगम, पन्नवणा, भगवती सूत्र आदि लिखने से जितना पुण्य होता है उतना पुण्य किसी को मुह्पत्ति देने से होता है

५५०० गर्भवती गायों को अभयदान देने से जो पुण्य होता है, यह एक मुह्पत्ति देने वाले को होता है।

२५००० शिखर युक्त जिनालयों के निर्माण करवाने से जितना पुण्य होता है, उतना पुण्य एक चरवाला देने से होता है।

मासक्षमण की तपस्या अथवा जीवदय हेतु 1 करोड़ पिंजरे निर्माण करने के सामान पुण्य एक आसन (बैठका) देने से होता है।

८४००० दानशालाओं को बंधवाने से जितना पुण्य होता है उतना पुण्य गुरु को द्वादशावर्त वंदन करने से होता है।

पांच सो धनुष प्रमाण वाली २८००० प्रतिमा भरवाने से जो पुण्य होता है उतना पुण्य एक इर्यावाहिया करने से मिलता है।

१०,००० गायों का एक गोकुल कहलाता हे, ऐसे १०००० गोकुलों के गायों को दान में देने से जो पुण्य मिलता है उतना पुण्य प्रतिक्रमण का उपदेश देने से मिलता हैं। (प्रबोध टीका)

मणिजडित स्वर्ण की सीढी युक्त, १००० स्तम्भ युक्त ऊँचा, स्वर्ण के तल वाला श्री जिनमंदिर का निर्माण करवाने से जितना पुण्य होता है उतना पुण्य तप सहित एक पौषध करने से मिलता है।

कोई व्यक्ति २० लाख करोड़ सोने का दान करे, उससे भी अधिक फल एक सामायिक करने से मिलता हे

दिवाली का छठ करने से एक लाख करोड़ उपवास का फल मिलता है।

मौन एकादशी का उपवास करने से १५० उपवास का फल मिलता है।थाली धोकर पीने एवं मंदिर का कचरा निकालने से आयम्बिल का लाभ मिलता है।

एक करोड़ सोना मुहर दान करने से या ७ मंजिल का सोने का मंदिर बनवाने से भी अधिक लाभ एक दिन का ब्रह्मचर्य पालन से मिलता है।

जिनमन्दिर की ध्वजा चडाने वाले की १०१ पीढ़ी नरक में नहीं जाती है।


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तिलक

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तिलक

जिनमंदिर जी में प्रवेश करते समय चन्दन का तिलक लगाया जाता है ।

पुरुष लंबे आकार का तिलक लगाते हैं तथा स्त्रियां गोल आकार का तिलक लगाती हैं ।

जहाँ तक संभव हो तिलक के लिए भी चन्दन स्वयं ही घिसना चाहिए

तिलक अर्धपद्मासन मुद्रा में लगाना चाहिए क्योंकि विभिन्न मुद्राओं से भिन्न भिन्न ऊर्जाओं का संचार होता है ।

योग विज्ञान अनुसार हमारे शरीर में ७ चक्र है । मस्तक के मध्य भौहों के ऊपर आज्ञा चक्र होता है

तिलक लगाने का अर्थ यही है की जिनमंदिर में प्रवेश करने से पूर्व हम तीर्थंकर परमात्मा की आज्ञा को शिरोधार्य करते हैं ।

चन्दन का स्वभाव शीतल है । तिलक लगाने से मस्तक द्वारा सम्पूर्ण शरीर में शीतलता का संचार होता है ।

लंबे तिलक की परिकल्पना उत्तमता के आधार सें बादाम के आकार से की गयी है , मंदिर के शिखर की भांति की गयी है तथा बाण की भांति की गयी है जिसका एकमात्र लक्ष्य उर्ध्व गति - मोक्ष की प्राप्ति है

सुबह लगाया गया तिलक हमें दिनभर ये प्रेरणा देता है की हम तीर्थंकरो की आज्ञा में हैं । अतः कुछ भी अनुचित दुराचार हम न करें

शाम को तिलक हटा देने की परिपाटी है क्योंकि चन्दन से सर्प आकर्षित होते हैं तथा संध्या के समय किसी की मृत्यु हो उसमे भी तिलक लगाकर जाना अविनय माना गया है ।

पहले के समय में तिलक सम्यक श्रावकत्व का चिन्ह था । अजैन व्यक्ति भी परिचित थे की जिसने चन्दन का तिलक लगाया है ,वह व्यक्ति ईमानदार जैन श्रावक है ।

प्राण जाए ,किन्तु तिलक नही मिटने दूंगा ,इसी समर्पण भाव से वर्षों पूर्व कपर्दी मंत्री ने राजसभा में अपने प्राणों की आहूति दे डाली थी।

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श्री शेरिसा पार्श्वनाथ

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श्री शेरिसा पार्श्वनाथ

श्री शेरीसा पार्श्वनाथ – श्री शोरीसा तीर्थ

कहा जाता है की शोरिसा किसी समयसोनपुर नगरी का एक अंग था| आज उस सोनपुर का तो नामोनिशान नहीं है, लेकिन शेरिसा आज भी एक भव्य व मनोरम तीर्थ स्थान है| इस जगह की प्राचीनता के चिन्ह खण्डहर अवशेषों व स्तंभों आदि में आज भी यहाँ पाए जाते है| वीर निर्वाण की १८ वि (विक्रम की १३वि) शताब्दी में श्री देवचन्द्राचार्यजी द्वारा श्री पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर की प्रतिष्ठा करवाने करवाने का उल्लेख है| उस समय पार्श्वप्रभु की प्रतिमा श्री “लोढन पार्श्वनाथ” के नाम से प्रसीद्ध थी| यहाँ पर एक खंडित प्रतिमा के परिवार पर अंकित लेख से ज्ञात होता है की विक्रम की १३वि शताब्दी में मंत्री वास्तुपाल-तेजपाल ने अपने भाई मालदेव व उनके पुत्र पुनसिंह प्रतिष्टित करवाया था| इन सबसे यह सिद्ध होता है की यह उससे भी प्राचीन है| कविवर लावण्यासमय ने विक्रम संवत् १५६२ में बड़े ही सुन्दर ढंग से “शेरिसा तीर्थ स्तवन” की भक्तिभाव पूर्वक रचना की है| इस कारण यह भी कहा जा सकता हैकि इस तीर्थ की जाहोजलाली सदियों से बनी है| यहाँ पर समय-समय पर आवश्यक जिणोरद्वार होते रहे| विक्रम की १६वि शताब्दी के पश्चात किसी समय मुस्लिम आक्रमणकारों के हाथ यह तीर्थ खंडित हुआ|विक्रम संवत् १६५५ में खंडित जिनालय के खंडहरों की खुदाई करने पर कुछ प्रतिमाएं प्राप्त हुई, उन्हें एक ग्वाले का घर खरीद कर उसमे बिराजमान की| विक्रम संवत् १६८८ में पांच प्रतिमाओं पर लेप करवाया गया व अहमदाबाद के क्षेष्टि साराभाई डाह्याभाई निर्मित नूतन जिनालय की विक्रम संवत् २००२ में तीर्थोद्वारक निर्मित संवत् २००२ में तिर्थोद्वारक आचार्य श्री विजयनेमीसुरिश्वर्जी के हाथो वैशाख शुक्ला दशम के दिन प्रतिष्ठा संपन्न हुई|
यहाँ पर भोयंरे में स्तिथ श्री पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा अत्याधीक सुन्दर व अपने आप में अनूठी है| यहाँ की पद्मावती देवी की प्राचीन सुन्दर प्रतिमा अभी नरोदा गाँव में है, जी दर्शनीय है|

श्री शेरिसा पार्श्वनाथ भगवान
मूलनायक श्री शेरिसा पार्श्वनाथ भगवान
आराधना मंत्र : ॐ ह्रीँ श्रीशेरिसापार्श्वनाथाय नम:
तीर्थाधिराज :- श्री शेरीसा पार्श्वनाथ भगवान, पद्मासनस्थ,
श्याम वर्ण, लगभग १६५ सें. मी. (६५ इंच)
(श्वेताम्बर मन्दिर)
तीर्थ स्थल :- शेरीसा गावँ के निकट पूर्व- दिशा में ।

શેરીસા તીર્થ

કલોલ અમદાવાદની. આજુબાજુ ઘણી જોવાલાયક જગાઓ અને ધાર્મિક તીર્થ આવેલું છે. કલોલથી મોટી ભોયણ જવાના રસ્તે, કલોલથી માત્ર ૮ કી.મી. દૂર આવેલું શેરીસા આવું એક સ્થળ છે. અહીં એક પ્રખ્યાત જૈન મંદિર આવેલું છે. તેરમી સદીમાં ગુજરાતના દાનવીર વસ્તુપાળ અને તેજપાળે અહીં ભગવાન નેમીનાથની વિધિપૂર્વક સ્થાપના કરીને સૌ પ્રથમ મંદિર બાંધ્યું હતું, એવી કથા છે. વિ. સં. ૧૫૬૨માં શ્રીલાવણ્યસમય નામના કવિએ શેરીસા તીર્થ પર સ્તવનો રચ્યાં હતાં. આ તીર્થનું રીપેરીંગ અને રીનોવેશન ચાલતું જ રહે છે.વિ. સં. ૨૦૦૨માં અહીં આરસનું નવું મંદિર બન્યુ છે. મંદિરના ગર્ભગૃહમાં જોધપુરના લાલ આરસ અને ઉત્સવપંડાલમાં મકરાણાના આરસ વાપર્યા છે.
શેરીસા તીર્થના ભવ્ય પ્રવેશદ્વારમાંથી અંદર દાખલ થયા પછી બંને બાજુ ખુલ્લી વિશાળ જગા નજરે પડે છે. વૃક્ષોની ઘટા અને તોરણોમાં થઈને થોડું સીધું ગયા પછી, થોડાં પગથિયાં ચડવાનાં છે. ઉપર ચડી મંદિરમાં પેસતાં જ મનમાં એક પ્રકારની સાતા વળે છે. સામે જ ગર્ભગૃહમાં મૂળનાયક ભગવાન શ્રી પાર્શ્વનાથ પદ્માસન સ્થિતિમાં બિરાજમાન છે. રંગ પરથી એમને લોઢણ પાર્શ્વનાથ પણ કહે છે. અહીં દર્શન કરીને મન પ્રસન્નતા અનુભવે છે. નીચે ભોંયરામાં ભગવાન પાર્શ્વનાથની મૂર્તિ બહુ સુંદર છે.

શેરીસા એ ભવ્ય રમણીય તીર્થ છે. અહીંનું વાતાવરણ ઘણું જ સરસ છે. મંદિરની એક બાજુ રહેવા માટેની રૂમો અને ભોજનશાળા છે.બીજી બાજુ મહેમાનો માટેની ભોજનશાળા છે. રસોઈ ખૂબ જ સરસ અને પીરસનાર ખૂબ ભાવથી પીરસે છે. પ્રવેશદ્વાર આગળ ઓફિસ આવેલી છે. ખુલ્લી જગામાં પ્રસંગોપાત સભામંડપ ઉભો કરી, ત્યાં મહારાજ સાહેબનું પ્રવચન સાંભળવાની વ્યવસ્થા કરાય છે. મંદિરની આજુબાજુના બગીચામાં બેસવાની અને બાળકોને રમવાની મજા આવે એવું છે.

શેરીસા તીર્થથી આશરે ૧૬ કી.મી. દૂર આવેલા પાનસર ગામે પણ એક સુંદર જૈન તીર્થ આવેલું છે. શેરીસાથી કલોલ થઈને પાનસર જવાય છે. આ મંદિર પણ ઘણું જ મોટું અને આકર્ષક છે. ખૂબ મોટી વિશાળ જગા, બગીચો, વૃક્ષો, રસ્તા, રહેવા માટે રૂમો, જમવાની સુવિધા - અહીં બધુ જ છે. આરસનું બનેલું આ મંદિર જૂનું છે, છતાં નવું જ લાગે છે. ભગવાનનાં દર્શન કરીને ધન્યતા અનુભવાય છે.

વામજ તીર્થ પણ કલોલની નજીક જ છે. અમદાવાદથી એક દિવસમાં શેરીસા, પાનસર અને વામજની ધાર્મિક યાત્રા સરળતાથી કરી શકાય છે. અમદાવાદથી કલોલ ગયા વગર, ઓગણજ, વડસર અને મોટી ભોયણ થઈને શેરીસા સીધું જવાય છે

Sherisha Tirth, near Kalol, near Ahmedabad & mulnayak is 23rd, Parshwanath dada.

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श्री माणिभद्र वीर का इतना "सौम्य" स्वरुप और कहीं नहीं है.

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श्री माणिभद्र वीर का इतना "सौम्य" स्वरुप और कहीं नहीं है. 
(जैसा दिख रहा है, उससे भी अधिक सौम्य और सुन्दर है). 

मूर्ति के नीचे काला भैरव और गौरा भैरव भी दिख रहे हैं
जिनसे उन्हें जिन-शासन की सेवा के लिए युद्ध करना पड़ा था.

(दोनों भैरव शक्ति को समझाने के बावजूद भी
उन्हें उनसे युद्ध करना पड़ा
क्योंकि भैरवों ने कहा की हम तो मंत्र शक्ति से बंधे हैं,
इसलिए आप से युद्ध करना ही पड़ेगा).

विशेष:
******
अब भी किसी को "मन्त्रों" का प्रभाव समझ में नहीं आये
तो ये उनका "दुर्भाग्य" है.

कई बार जो "चीजें" हमें सुलभ होती हैं,
उन्ही की हम क़द्र नहीं करते.

स्थल:
*****
श्री सूरजमंडन पार्श्वनाथ, सोमेश्वरा, वेसु के पास, सूरत.

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परम कृपालु श्री माणिभद्र वीर देव, परिमल जैन संघ, अहमदाबाद ।।

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खुश रहने का मतलब यह नहीं की सब ठीक है!

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खुश रहने का मतलब यह नहीं की सब ठीक है!इसका मतलब यह है की, आपने अपने दु:खों से ऊपर उठकर जीना सिख लिया है!

हे जीव!
दुख में तो ऐसे डर जाते हो कि जैसे आज तक दुःख भोगा ही ना हो, और सुख में तुम ऐसे अभिमानी हो जाते हो की मेरे से बड़ा कोई है ही नहीं!

हे जीव तुम हर स्थिति में एक जैसे भाव रखने का प्रयास करो,सुख में फूले न समाओ और दुःख में डरो नहीं!

याद रखो!
"सुख ने आकर के चले जाना है,
दुख ने भी आकर चले जाना है"

धीरे-धीरे समझा तु इस मन को,
इस मन को,हाँ,इस मन को!

हम मौन का अभ्यास करें,
"मौन से जानो तुम हो कौन"
धीरे-धीरे अभ्यास से 
हम सीख जाएं । 
-----------------

हर रोज़ करें
नित्य अपने पास वाले जैन धर्म स्थान पर जाना,
गुरुओं की वाणी सुनना,
प्रवचन में सुनाई गई बातों को अपने जीवन में उतारना,
औरों को भी धर्म की बातें सिखाना
जय जिनेंद्र

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Nakoda Bhairav

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