ॐ ह्रीँ श्री शंखेश्वरपार्श्वनाथाय नम: દર્શન પોતે કરવા પણ બીજા મિત્રો ને કરાવવા આ ને મારું સદભાગ્ય સમજુ છું.........જય જીનેન્દ્ર.......

जंकिंची नाम तिथं

Image may contain: 1 person

जंकिंची नाम तिथं, सग्गे पायालि मानुसे लोए,
जांईं जिन बिम्बाईं, ताईं सव्वाई वंदामी ।।
जहां भी जिन तीर्थ हो, चाहे स्वर्ग में, पाताल लोक यानि नर्क में या फिर मनुष्य लोक में, जहां भी जिन प्रतीमा जी हो, ऊन सभी को मेरा वंदन हो ।।
BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.

SHEETALNATHJI........

Image may contain: 1 person


BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.

सप्तभय इसप्रकार होते है:

No automatic alt text available.

सम्यक दर्शन का पहला अंग होता है नि:शंकितपना, शंका का एक अर्थ है संदेह और दूसरा भय। सम्यकदृष्टी जिव संहेह रहित तो होता है लेकिन वो सप्त रहित भी होता है।

सप्तभय इसप्रकार होते है:
१)इसलोक का भय
२)परलोक का भय
३)मरण का भय
४)वेदना का भय
५)अनरक्षा भय
६)अगुप्ति भय
७)अकस्मात् भय

१)इसलोक का भय-
अपने परिग्रह,कुटुम्ब,आजीविका आदि के बिगड़ जाने का भय

२)परलोक का भय-
मरण पाकर परलोक में जाकर नहीं मालूम किस गति व् क्षेत्र में जाऊंगा ऐसा भय

३) मरण का भय-
मरण के समय मेरा नाश होगा ना जीने कितना दुःख होगा। अपने आभाव का भय होना मरण का भय है।

४) वेदना भय-
रोगादि कष्ट आने का भय

५) अनरक्षा भय-
अपना कोई रक्षक नहीं है ऐसा जानकर डरना

६) अगुप्ती भय-
अपनी वस्तु चोरी हो जाने का भय और अपनी छुपने की जगह का पता चल जाने का भय

७)अकस्मात भय-
अचानक दुःख उत्पन्न ना हो जाये ऐसा लगना

BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.

भायखला (वेस्ट) मुम्बई में शंखेश्वर पार्स्वनाथ जिनालय

Image may contain: indoor


सम्यग्दर्शन-बोध-व्रत्तममलं, रत्नत्रयं पावनं,
मुक्ति श्रीनगराधिनाथ – जिनपत्युक्तोऽपवर्गप्रदः
धर्म सूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं, चैत्यालयं श्रयालयं,
प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी, कुर्वन्तु नः मंगलम्

अर्थ - निर्मल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये पवित्र रत्नत्रय हैं श्रीसम्पन्न मुक्तिनगर के स्वामी भगवान् जिनदेव ने इसे अपवर्ग (मोक्ष) को देने वाला कहा है इस त्रयी के साथ धर्म सूक्तिसुधा (जिनागम), समस्त जिन-प्रतिमा और लक्ष्मी का आकारभूत जिनालय मिलकर चार प्रकार का धर्म कहा गया है वह हमारे पापों का क्षय करें और हमें सुखी करे!
BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.

भगवान : *श्री भाग्यवर्धन पार्श्वनाथ जी* मंदिर : *♈श्री लब्धि निधान जैन तीर्थ ♈* *चोहटन*

Image may contain: 2 people


BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.

श्री पदमावती माता - श्री जीरावला पार्श्र्वनाथ देरासर राजस्थान

Image may contain: 1 person


BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.

आत्म-चिंतन” भाग – 1

Image may contain: indoor
आत्म-चिंतन” भाग – 1

केवल ज्ञान प्राप्त करने के बाद तीर्थंकरों” ने सतत ज्ञान-गंगा बहाई है.

पूरे “शास्त्र” पढ़ने का सार है :

आत्मा” का उत्थान!
जैन साहित्य जो संसार भर के सभी धर्मों में सबसे सरल(!),
विशाल, श्रेष्ठ, क्लिष्ट परन्तु साथ में लचीला ( यानि फ्लेक्सिबल” ) भी है.

हज़ारों शास्त्र सिर्फ “एक” ही उद्देश्य के लिए लिखे गए
मनुष्य” अपनी “आत्मा” को समझे
क्योंकि पूरे भव-चक्र में “मनुष्य जीवन” मात्र ८ बार ही मिलता है.

भव-चक्र यानि “जीव” जो ८४ लाख योनियों के जन्म-मरण में फंसा है,
उसे मनुष्य जन्म मात्र ४८ बार ही मिलेगा. यदि वो मोक्ष नहीं गया,
तो फिर ८४ लाख जीव योनियों में भटकता रहेगा, फिर कभी मोक्ष नहीं जा सकेगा.

इसी बात को “ध्यान” में रखते हुए तीर्थंकर, केवली, पूर्वधर, आचार्य, उपाध्याय और साधुओं ने “लाखों” ग्रन्थ लिखे ताकि ज्यादा से ज्यादा “मनुष्य” अपने जीवन” को सार्थंक कर सकें.

कलिकाल सर्वज्ञ” “श्री हेमचन्द्राचार्य” जी ने ३.५ करोड़ “श्लोक” लिखे हैं और श्री हरिभद्र सूरी” ने १४४४ ग्रन्थ” लिखे हैं. परन्तु “जैनी” होने का “दावा” करने वाले क्या अपने “पूरे जीवन” में मात्र १०० श्लोक या १ ग्रन्थ भी पढ़ने की इच्छा” रखते हैं?

नहीं” पढ़ने का कारण हैं, आत्मा” नाम के तत्त्व की घोर उपेक्षा”

कई लोगों के बारे में तो यहाँ तक कहा जा सकता है मानो उन्होंने” प्रतिज्ञा ले रखी हो कि
आत्मा” नाम का “फितूर” जानना ही नहीं है.

विशेष:
पूरे ब्रह्माण्ड में सिर्फ और सिर्फ एक ही तत्त्व (वस्तु) ऐसी है तो अपने आप” को देख सकती है. और वो है
आत्मा.”

यहाँ किसी को भ्रम हो सकता है कि मैं तो अपने आप को आईने में रोज देख रहा हूँ. पर ये आप नहीं हो, आप के शरीर से जब आत्मा “निकल” जायेगी, तो क्या वही “शरीर” खुद को देख सकेगा? इसका मतलब देखने” वाला कोई और है जिसको अभी तक आपने नहीं देखा.

आत्म-चिंतन : भाग – 2

५०० शिष्यों के नायक इंद्रभूति” (गौतमस्वामी) को इस बात का संशय था कि

आत्मा” है या नहीं!

(कहे जाने वाले बड़े बड़े सम्प्रदायों; जिनके लाखों फोल्लोवेर्स हों,
उनकी भी यही स्थिति हो सकती है).

मात्र ये एक “संशय” उनके पूरे ज्ञान” को “झकझोर” रहा था (फीलिंग इरिटेटेड).

(जैसे परीक्षा में टिपिकल प्रश्न का उत्तर देते समय मात्र उसका एक पॉइंट ही विद्यार्थी को उलझन में डाल देता है और यदि वो प्रश्न भी पहला ही हो तो फिर परीक्षार्थी पूरा पेपर ही अच्छी तरह नहीं दे पाता…).

और भगवान महावीर से उस शंका” का निवारण होते ही, उनके शिष्य भी बन गए!

शंका” मात्र एक…. और जिसने वो शंका मिटाई, उसका “शिष्य” बन जाना…खुद के ५०० शिष्यों के होते हुए !

सोचो, कितनी शर्म आई होगी.
मानो कि ये “घटना” आपके लिए ही घटी हो – मतलब आप ही “इंद्रभूति” थे और आप के ही ५०० फोल्लोवर्स थे…..(आजकल फेसबुक में भी आपके कई फोल्लोवर्स होते हैं…),

उनके मन में आप के प्रति क्या विचार आया होगा!…..कि आज तक हम उस आदमी को फॉलो कर रहे थे जिसे जड़ और चेतन का भी ज्ञान नहीं था!

परन्तु “गौतमस्वामी” ने अत्यंत विनयपूर्वक” उसे ना सिर्फ उनके स्पष्टीकरण को “स्वीकार” किया, बल्कि खुद को “पूरा” “भगवान महावीर” को “सौंप” दिया.

आप सोच रहे होंगे कि क्या ऐसे गौतम स्वामी को आत्मा” जैसी बात का भी ज्ञान नहीं था?

प्रश्न की पूर्वभूमिका:

भगवान महावीर द्वारा “आत्मा” की शंका का निवारण करने के कारण और ‘आत्मा’ के बारे में यही ज्ञान हमारे आचार्यों, उपाध्यायों और साधुओं की पट्ट परंपरा के कारण हमें और हमारे पूर्वजों को प्राप्त होता रहा है.

आत्म-चिंतन :

क्या आपको ये “ज्ञान” हो गया है की आप ये मनुष्य जीवन आत्मा” की उन्नति के लिए जी रहे हैं?

क्या ऐसा कभी “एहसास” (feeling) हुआ है कि आत्मा” (soul) का “अस्तित्व” (existence) इस शरीर”(body) में है,

यदि हाँ, तो समझ लेना आत्मा के “उद्धार” (moksh) की तैयारी शुरू हो गयी है.

BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.

नमस्कार मंत्र में अरिहंत देव को पहले नमस्कार इसलिए किया जाता है

Image may contain: 1 person, indoor
नमस्कार मंत्र में अरिहंत देव को पहले नमस्कार
इसलिए किया जाता है क्योकि सिद्ध भगवान
कि पहचान कराने वाले अरिहंत ही है। 

अरिहंत मुनि जैसे होते है और सिद्ध भगवन निरंजन
है व अशरीरी होने से निराकार है।

इस वक्त तिरछा लोक के महाविदेह क्षेत्र में २०
अरिहंत देव है और वे साधू कि तरह अचित आहार
करते है।

अरिहंत देव काल करके मोक्ष में जाते है ।

इस भरत क्षेत्र के आखरी अरिहंत (तीर्थंकर)

महावीर स्वामी अभी सिद्ध क्षेत्र में है ।

२४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव,
९ प्रतिवासुदेव, ये त्रेसठ महापुरुष हर
अवसर्पिणी एवं उत्सर्पिणी में होते हैं ।
इन्हें त्रिषष्ठिशलाका पुरुष कहते हैं । इनकी संख्या न
घटती हैं, न बढती हैं ।
जैन धर्म में क्रमश: चौबीस तीर्थंकर, बारह
चक्रवर्ती, नौ बलभद्र, नौ वासुदेव और
नौ प्रति वासुदेव मिलाकर कुल ६३ पुरुष हुए हैं।
वर्तमान काल चौबीस तीर्थंकर :
(१) ऋषभ,
(२) अजित,
(३) संभव,
(४) अभिनंदन,
(५) सुमति,
(६) पद्मप्रभ,
(७) सुपार्श्व,
(८) चंद्रप्रभ,
(९) सुविधिनाथ
(१०) शीतल,
(११) श्रेयांश,
(१२) वासुपूज्य,
(१३) विमल,
(१४) अनंत,
(१५) धर्म,
(१६) शांति,
(१७) कुन्थु,
(१८) अरह,
(१९) मल्लि,
(२०) मुनिसुव्रत,
(२१) नमि,
(२२) नेमि,
(२३) पार्श्वनाथ और
(२४) महावीर।

*बारह चक्रवर्ती :
(१) भरत,
(२) सगर,
(३) मघवा,
(४) सनतकुमार,
(५) शांति,
(६) कुन्थु,
(७) अरह,
(८) सुभौम,
(९) पदम,
(१०) हरिषेण,
(११) जयसेन और
(१२) ब्रह्मदत्त।

नौ बलभद्र :
(१) अचल,
(२) विजय,
(३) भद्र,
(४) सुप्रभ,
(५) सुदर्शन,
(६) आनंद,
(७) नंदन,
(८) पदम और
(९) राम।

नौ वासुदेव :
(१) त्रिपृष्ठ,
(२) द्विपृष्ठ,
(३) स्वयम्भू,
(४) पुरुषोत्तम,
(५) पुरुषसिंह,
(६) पुरुषपुण्डरीक,
(७) दत्त,
(८) नारायण और
(९) कृष्ण।

नौ प्रति वासुदेव :
(१) अश्वग्रीव,
(२) तारक,
(३) मेरक,
(४) मुध,
(५) निशुम्भ,
(६) बलि,
(७) प्रहलाद,
(८) रावण और
(९) जरासंघ।


BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.

जैन रामायण का एक पात्र है दशमुख यानि रावण

Image may contain: 2 people

जैन रामायण का एक पात्र है दशमुख यानि रावण 

रावण जब भी युद्ध के लिए अथवा किसी कार्य से बाहर जाता था तब वह जिन प्रतिमा साथ में रखता था , जहा भी समय मिलता वो परमात्मा की पूजा विधि पूर्वक भाव सहित करता था ।

हमारे शास्त्र और गुरु भगवंत भी कहते हैं कि जैन समुदाय के घरों में जिन प्रतिमा का होना अत्यंत आवश्यक है । 

लाखो करोड़ों के बंगले और फ्लैट हो पर अगर उसमे गृह जिन मंदिर या कम से कम 1 जिन प्रतिमा भी न हो तो उस घर को श्मशान के समान माना गया है ।

खासकर वर्तमान के परिदृश्य में जब घर के बच्चों के प्रातः काल स्कूल आदि के समय के कारन बच्चे 5-6 दिन तक परमात्मा के दर्शन तक नहीं कर पाते हैं ।

ऐसे समय में घर मंदिर या घर में जिन प्रतिमा का होना नितांत आवश्यक है , तभी बच्चों में धर्म के संस्कार रहेंगे ।

आशातना के डर या बहाने से ऐसा ना करने की बजाय गुरु भगवंतों से सही मार्गदर्शन लेकर हर घर में परमात्मा की प्रतिमा रखनी चाहिए ।

घर पर प्रतिमा जी है इसलिए समय और शक्ति होने के बावजूद जिन मंदिर जाकर दर्शन पूजा नहीं करना ,वो अनुचित है ।

BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.

*"धर्म" की सबसे सरल व्याख्या*

Image may contain: 3 people, indoor
*"धर्म" की सबसे सरल व्याख्या*
*किसी भी आत्मा को हमारी*
*वजह से दुःख ना पहुँचे,*
*यही धर्म है..*


BEST REGARDS:- ASHOK SHAH & EKTA SHAH
LIKE & COMMENT - https://jintirthdarshan.blogspot.com/
THANKS FOR VISITING.